अंचलो से लुप्त होती जा रही है बारिश के दिनों में बजने वाली बांसुरी की मधुर आवाज

क्रेडिट सोर्स : रिपोर्टेड अविनाश गिरी झाबुआ
झाबुआ निप लंबे समय बाद बांसुरी की आवाज सुनाई दी जो काफी मधुर लग रही थी जैसे भगवान कृष्ण गायों को घास चराते समय जंगलो में अपनी मधुर बांसुरी बजाकर सभी का मन मोहलेते थे ग्रामीण अंचलों में भी कुछ समय पहले बारिश में बांसुरी की मधुर आवाज चारो ओर आसानी से सुनाई देती थी लेकिन जैसे-जैसे समय परिवर्तन हुआ , आधुनिकता की वजह से यह बासुरी ग्रामीण अंचलों से गायब होती जा रही है ओर पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है, सावन महीने में जहां सभी जगह हरियाली होती है ऐसे में पशुपालक व ग्वाले अपने मवेशियों को घास चराने के लिए जंगल में ले जाते थे .
ओर अपना समय बिताने के लिए बांसुरी बजाते थे उनकी बांसुरी की आवाज दूर दूर तक जाती थी सुनने वाले मोहित होकर सुनते थे लेकिन अब ऐसा कुछ देखने को नही मिलता अब भी कही कही कुछ गांव मे एक या दो लोग है जो बांसुरी बजाते मिल जाते है ,आज जब हमारा ग्राम सागड़िया में जाना हुआ तो वहां पर एक पशुपालक बांसुरी पर धुन बजा रहा था तो हम भी वहां पर पहुंच गए और हमारे मोबाइल में उस धुन को कैद कर लिया बांसुरी बजा रहा रामचंद्र मीणा से बात की तो उसने बताया कि हमें बांसुरी बजाना बहुत अच्छा लगता है
खासकर सावन के महीने में बजाने पर मुझे बहुत आनन्द आता है मैने बचपन से ही बांसुरी बजाना सीख लिया था बारिश की हरियाली में पशु को घास चराते वक्त बांसुरी बजाने का आनन्द लेता हूं वही गाव के दिलीप डामर बताते है कि हमे भी सुबह शाम बांसुरी की आवाज सुनाई देती है जो बहुत मधुर लगती है में भी सीखने की कोशिश करता हु पर अभी सिख नही पाया हूं।